Sunday, 28 December 2014

मेरी नई  कविता !!!

कुछ  ख़्वाब दबे से दिल मै 
और कुछ आँखों  से बयान न हो 
तब  धडकता है जो दिल 
उससे  सर्जन होता शब्दों का  !


कुछ होठो  तक आते है और कुछ 
बाकि  वहीं  धड़कन  बन के रह जाती है 
और कुछ कविता बन जाते है !

लोग  अर्थ  खोजते है उनमे 
कुछ  पढ़ के  प्रसन  हो जाते है 
मै  वही हूँ  -जहां  था  फिर भी 
और नये शब्द  ढूंढ़ता  हूँ  
और अर्थ भी - और मेरी नई  कविता !
अरुण तिकू
२४ दिसंबर २०१४ 

उस शाम जब मैं
कुछ कहना चाहता था
तब मेरे शब्द भी
कमजोर पड गये
और, वो जो थे मेरे ,
मन के भाव ,
उस शाम से भी मौन पड गए !

साँस फिर भी चलती रही थी ,
धडकने , धडकनो सी बजती रही थी
एक तस्बीर, नए संबंधो की घड़ती रही थी !
सहसा , एक क्षण फिर उभरा ,
और मुझे सम्पूर्ण कर गया ,
मेरे विश्वास को
फिर से दृढ कर गया !
और मै समज गया
शाम क्यों ढलती हैं ,
और, रात के बाद ही तो
नई सुबह निकलती है !
अरुण तिक्कू
१७ दिसम्बर २०१४