Sunday, 28 December 2014


उस शाम जब मैं
कुछ कहना चाहता था
तब मेरे शब्द भी
कमजोर पड गये
और, वो जो थे मेरे ,
मन के भाव ,
उस शाम से भी मौन पड गए !

साँस फिर भी चलती रही थी ,
धडकने , धडकनो सी बजती रही थी
एक तस्बीर, नए संबंधो की घड़ती रही थी !
सहसा , एक क्षण फिर उभरा ,
और मुझे सम्पूर्ण कर गया ,
मेरे विश्वास को
फिर से दृढ कर गया !
और मै समज गया
शाम क्यों ढलती हैं ,
और, रात के बाद ही तो
नई सुबह निकलती है !
अरुण तिक्कू
१७ दिसम्बर २०१४

No comments:

Post a Comment